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ahlam1399 05-16-2026 12:38 PM

यूजीसी नियमों पर nsui की एक और डिमांड, abvp ने भी बुलंद की आवाज; किसने क्या कहा?
 
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यह रà¤؟à¤ھोरà¥چà¤ں य ज स न à¤ھर केंदà¥چरà¤؟à¤� � है। यूजीसी नियमों पर NSUI की एक और डिमांड, ABVP ने भी बुलंद की आवाज; किसने क्या कहा?Jan 27, 2026 08:21 pm ISTKrishna Bihari Singh लाइव हिन्दुस्तान, अभिनव उपाध्याय, नई दिल्ली एनएसयूआई ने यूजीसी के नए नियमों को और प्रभावी बनाने की मांग की है। समितियों में पारदर्शिता के लिए न्यायाधीशों को भी शामिल किया जाना चाहिए। वहीं एबीवीपी ने यूजीसी से नियमों को लेकर पैदा हो रही भ्रांतियां दूर करने को कहा है। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी के नए नियमों का स्वागत किया है लेकिन इसे और प्रभावी बनाने की मांग की है। NSUI का कहना है कि भेदभाव विरोधी समिति केवल कागजी नहीं होनी चाहिए वरन इसमें एससीए एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों और शिक्षकों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसमें न्यायाधीशों को शामिल किया जाना चाहिए। वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) यूजीसी के नए नियमों में स्पष्टता की कमी पर चिंता जताई है।कागजी कमेटी नहीं होनी चाहिएनेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने यूजीसी के नए नियमों का स्वागत करते हुए इसे शिक्षा संस्थानों में फैले भेदभाव को खत्म करने के लिए एक जरूरी कदम बताया है। हालांकि NSUI ने यह भी साफ किया है कि इन नियमों के लिए बनने वाली कमेटी सिर्फ दिखावा या कागजी बनकर नहीं रहनी चाहिए।रिटायर न्यायाधीशों को शामिल करने की मांगएनएसयूआई का कहना है कि समिति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होना चाहिए। इसके साथ ही इन वर्गों के शिक्षकों को भी समिति में शामिल करना जरूरी है। NSUI ने समिति की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए इसमें कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शामिल करने की मांग भी की है। संगठन ने आरोप लगाया कि मौजूदा यूजीसी नियम समिति की संरचना को लेकर मौन है।खत्म हो जाएगा न्याय का मकसदNSUI का आरोप है कि यूजीसी के मौजूदा नियम समिति के नेतृत्व और बनावट के बारे में स्पष्ट नहीं हैं। इससे डर है कि यह समिति विश्वविद्यालय प्रशासन के हाथ की कठपुतली बन सकती है। ऐसी स्थिति में समानता और न्याय का उद्देश्य खत्म हो जाएगा। NSUI ने पुराने अनुभवों का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले भी कई समितियां, खासकर भेदभाव से जुड़ी समितियां, केवल दिखावा साबित हुईं। वे पीड़ितों को न्याय दिला सकीं।तय हो दोषियों की जवाबदेहीएनएसयूआई ने कहा कि आरक्षण नीतियों के ठीक से लागू नहीं होने और एनएफएस के कारण एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। यूजीसी एक स्वतंत्र और शक्तिशाली समिति बनाए जो ??

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  • यूजीसी नियमों पर NSUI की एक और डिमांड, ABVP ने भी बुलंद की आवाज; किसने क्या कहा?Jan 27, 2026 08:21 pm ISTKrishna Bihari Singh लाइव हिन्दुस्तान, अभिनव उपाध्याय, नई दिल्ली एनएसयूआई ने यूजीसी के नए नियमों को और प्रभावी बनाने की मांग की है। समितियों में पारदर्शिता के लिए न्यायाधीशों को भी शामिल किया जाना चाहिए। वहीं एबीवीपी ने यूजीसी से नियमों को लेकर पैदा हो रही भ्रांतियां दूर करने को कहा है। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी के नए नियमों का स्वागत किया है लेकिन इसे और प्रभावी बनाने की मांग की है। NSUI का कहना है कि भेदभाव विरोधी समिति केवल कागजी नहीं होनी चाहिए वरन इसमें एससीए एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों और शिक्षकों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसमें न्यायाधीशों को शामिल किया जाना चाहिए। वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) यूजीसी के नए नियमों में स्पष्टता की कमी पर चिंता जताई है।कागजी कमेटी नहीं होनी चाहिएनेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने यूजीसी के नए नियमों का स्वागत करते हुए इसे शिक्षा संस्थानों में फैले भेदभाव को खत्म करने के लिए एक जरूरी कदम बताया है। हालांकि NSUI ने यह भी साफ किया है कि इन नियमों के लिए बनने वाली कमेटी सिर्फ दिखावा या कागजी बनकर नहीं रहनी चाहिए।रिटायर न्यायाधीशों को शामिल करने की मांगएनएसयूआई का कहना है कि समिति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होना चाहिए। इसके साथ ही इन वर्गों के शिक्षकों को भी समिति में शामिल करना जरूरी है। NSUI ने समिति की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए इसमें कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शामिल करने की मांग भी की है। संगठन ने आरोप लगाया कि मौजूदा यूजीसी नियम समिति की संरचना को लेकर मौन है।खत्म हो जाएगा न्याय का मकसदNSUI का आरोप है कि यूजीसी के मौजूदा नियम समिति के नेतृत्व और बनावट के बारे में स्पष्ट नहीं हैं। इससे डर है कि यह समिति विश्वविद्यालय प्रशासन के हाथ की कठपुतली बन सकती है। ऐसी स्थिति में समानता और न्याय का उद्देश्य खत्म हो जाएगा। NSUI ने पुराने अनुभवों का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले भी कई समितियां, खासकर भेदभाव से जुड़ी समितियां, केवल दिखावा साबित हुईं। वे पीड़ितों को न्याय दिला सकीं।तय हो दोषियों की जवाबदेहीएनएसयूआई ने कहा कि आरक्षण नीतियों के ठीक से लागू नहीं होने और एनएफएस के कारण एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। यूजीसी एक स्वतंत्र और शक्तिशाली समिति बनाए जो ??

Source: https://www.livehindustan.com/ncr/ugc-rules-nsui-and-abvp-also-raises-its-voice-know-their-demands-201769521937530.html


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