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مشاهدة النسخة كاملة : Vat Savitri vrat katha in hindi: वट सावित्री व्रत पौराणिक कथा, सावित्री और सत्यवान की


ahlam1399
05-16-2026, 11:09 AM
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Vat Savitri vrat katha in hindi: वट सावित्री व्रत पौराणिक कथा, सावित्री और सत्यवान की कहानी जरूर पढ़ेंMay 16, 2026 04:45 am ISTAnuradha Pandey लाइव हिन्दुस्तान Vat Savitri vrat katha in hindi: वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं। ऐसा कहा जाता है जो इस व्रत को करता है, उसके पति की आयु लंबी होती है। भगवान्* श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को इस व्रत की कहानी सुनाई थी, जो इस प्रकार है। आज रखा जाएगा वट सावित्री व्रत। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं। ऐसा कहा जाता है जो इस व्रत को करता है, उसके पति की आयु लंबी होती है। इसे सावित्री ने सत्यवान के लिए किया था। भगवान्* श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को इस व्रत की कहानी सुनाई थी, जो इस प्रकार है। प्राचीन कालमें मद्रदेश (पंजाब) -में एक बड़ा पराक्रमी, सत्यवादी, क्षमाशील, प्रजापालन में तत्पर अश्वपति नामका राजा राज्य करता था, उसे कोई संतान न थी। इसलिए उसने अपनी पत्नि के साथ सावित्री की आराधना की । कुछ काल के अनन्तर पर व्रत के प्रभाव से ब्रह्माजी की पल्ली सावित्री ने प्रसन्न हो राजा को वर दिया कि तुम्हें एक कन्या उत्पन्न होगी । कुछ दिन बाद राजा को एक दिव्य कन्या उत्पन्न हुई। कन्या का नाम सावित्री ही रखा। धीरे-धीरे वह विवाह के योग्य हो गई । सावित्री ने भी भृगु के उपदेशसे सावित्री व्रत किया।एक दिन वह पिताके पास गई ओर प्रणाम कर बैठ गयी । पिता ने सावित्री को विवाह योग्य जानकर अमात्यो से उसके विवाह के लिए कोई योग्य किसी श्रेष्ठ वर को न देखकर पिता अश्वपति ने सावित्रीसे कहा पुत्रि !

तुम वृद्धजनों तथा अमात्योकि साथ जाकर स्वयं ही अपने अनुरूप कोई वर देख लो।' सावित्री भी पिता की आज्ञा से राजर्षियो के आश्रमों, सभी तीर्थो ओर तपोवनों में घूमती हुईं तथा वृद्ध ऋषियोंका अभिनन्दन करती हुईं वह मन्त्रियोंसहित पुनः अपने पिताके पास लौट आई ।ये भी पढ़ें:Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री व्रत के दिन गलती से ना करें ये 7 कामसावित्रीने देखा कि राजसभामें देवर्षि नारद बेठे हुए हैं। सावित्रीने देवर्षिं नारद ओर पिता को प्रणामकर अपना वृत्तान्त इस प्रकार बताया महाराज !

शाल्वदेश में द्युमत्सेन नाम के एक धर्मात्मा राजा हैं । उनके सत्यवान्* नामक पुत्र का मैंने अपना वर चुना है। सावित्री की बात सुनकर देवर्षिं नारद कहने लगे-राजन्*!

इसने बाल्य-स्वभाववश उचित फैसले नहीं लिया। द्युमत्सेन का पुत्र सभी गुणों से सम्पन्न है, परंतु उसमे एक बड़ा भारी दोष है कि आज के ही दिन ठीक एक साल के बाद उसकी मृत्यु हो जायगी। देवर्षिं नारद की वाणी सुनकर राजा ने सावित्री से किसी अन्य वरको ढ़ूढ़ने के लिए कहा।सावित्री बोली कि राजाओंकी आज्ञा एक ही बार होती है। पण्डितजन एक ही बार बोलते हैं।कन्या भी एक ही बार दी जाती है-ये तीनों बातें बार-बार नहीं होती, । सत्यवान्* दीर्घायु हो अथवा अल्पायु, निर्गुण हो या गुणवान्*, मैने तो उसका वरण कर ही लिया, अब मैं दूसरे पतिको कभी नहीं चुनूंगी। जो कहा जाता है, उसका पहले विचारपूर्वक मन में निश्चय कर लिया जाता है ओर जो वचन कह दिया जाए वही करना चाहिए। नारदजीने कहा-राजन्*!

आपकी कन्या को यही अभीष्ट है तो इस कार्य में शीघ्रता करनी चाहिए । आपका यह दान-कर्म निर्विघ्न सम्पन्न हो ।' इस तरह कहकर नारद मुनि चले गये ओर राजा ने भी शुभ मुहूर्तम सावित्री का सत्यवान से विवाह कर दिया। परंतु नारदमुनि की वाणी सावित्री के हदयमें खटकती रहती थी । जब एक साल पूरा होने को आया, तब सावित्रीने विचार किया कि अब मेरे पति की मृत्यु का समय समीप आ गया है । यह सोचकर सावित्री ने भाद्रपद मास के शुक्ल पक्षक द्वादशी से तीन रात्रि का व्रत ग्रहण कर लिया और वह भगवती सावित्री का जप, ध्यान, पूजन करती रहीं । उसे यह निश्चय था कि आजसे चौथे दिन सत्यवान्*की मृत्यु होगी । सावित्रीने तीन दिन-रात नियम से व्यतीत किये। चौथे दिन देवता-पितरों को संतुष्ट कर उसने अपने ससुर ओर सास के चरणो में प्रणाम किया।ये भी पढ़ें:Vat Savitri Puja: वट सावित्री की पूजा में क्या-क्या लगता है? नोट करें सामग्रीसत्यवान ने सावित्री से कहा-वन में जानेके लिये अपने सास-ससुरसे पूछ लो।' वह पूछने गई। पहले तो सास-ससुरने मना किया, किंतु सावित्री के बार-बार आग्रह करने पर उन्होनें जाने की आज्ञा दे दी। दोनों साथ-साथ वन में गये। सत्यवान ने वहां काष्ठ काटकर बोला, परंतु उसी समय उसके मस्तक में महान्* वेदना उत्पन्न हुई । उसने सावित्री से कहा--मेरे सिर में बहुत व्यथा हे, इसलिये थोड़ी देर विश्राम करना चाहता हूं । सावित्री अपने पतिके सिर को अपनी गोद में लेकर बेठ गयी । इतने में ही यमराज वहां आ गए। सावित्रीने उन्हें देखकर प्रणाम किया और कहा-हे प्रभो !

आप देवता, दैत्य, गन्धर्व आदि मे से कौन हैं? मेरे पास क्यों आए हैं? धर्मराज ने कहा-सावित्री!

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