देश के सबसे बड़े को-वर्किंग स्टार्टअप ‘ऑफिस’ के सीईओ अमित रमानी से बातचीत


को-वर्किंग स्पेस यानी काम की ऐसी जगह जहां कई कंपनियों के लोग काम कर सकते हों। विकसित देशों के साथ भारत में भी इसका चलन तेजी से बढ़ रहा है। चाहे वे बड़ी कंपनियां हों, एसएमई, स्टार्टअप या व्यक्तिगत प्रोफेशनल। इसकी सबसे बड़ी वजह है खर्च। अनुमान है कि को-वर्किंग वाली जगह से कंपनियां अपने ऑपरेशनल खर्च 30% से 50% तक कम कर सकती हैं। किसी कंपनी को तत्काल जगह चाहिए, तो वह भी मिल सकती है। ‘ऑफिस’ (Awfis) भारत की सबसे बड़ी को-वर्किंग स्टार्टअप है। इसके संस्थापक अमित रमानी ने बताया कि को-वर्किंग स्पेस एसएमई के लिए ज्यादा फायदेमंद है। उन्हें कम खर्च में बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर मिलता है। भारत में यह बिजनेस हर साल लगभग दोगुना हो रहा है। अभी करीब 1.1 करोड़ वर्ग फुट को-वर्किंग में है। यह 5 साल में 10 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंचने का अनुमान है। अमित से बातचीत के मुख्य अंश :-
एक साथ कई कंपनियों के काम करने की जगह यानी को-वर्किंग अभी 1.1 करोड़ वर्ग फीट में, 5 साल में 9 गुना बढ़ने का अनुमान
  ‘ऑफिस’ अपने यहां आने वाली कंपनियों को ग्रुप इंश्योरेंस की सुविधा देती है, लोगों को कम ब्याज पर कर्ज भी मिलता है
को-वर्किंग का आइडिया कैसे आया?
पहले हम भी एसएमई थे। कम पैसे में अच्छा इन्फ्रास्ट्रक्चर मिलने में दिक्कत आती थी। जगह अच्छी हो तो किराया बहुत होता था। पैसे कम हैं तो सी-डी ग्रेड की जगहों पर जाना पड़ता था। तब सोचा, दूसरे कारोबारियों को भी ऐसी दिक्कतें आती होंगी। वहीं से को-वर्किंग ऑफिस का आइडिया आया और अप्रैल 2015 में कंपनी शुरू की।
को-वर्किंग कॉन्सेप्ट के बारे में बताइए।
इसमें जगह की फ्लेक्सिबिलिटी होती है। आपको एक आदमी के लिए जगह चाहिए या 500 लोगों के लिए, एक दिन के लिए चाहिए या पूरे साल के लिए। सब आपकी जरूरत के मुताबिक उपलब्ध होगा। हमने अपने सेंटर ऐसी जगह बनाए हैं जहां लोग 15-20 मिनट की ड्राइव करके पहुंच सकते हैं।
यह किसके लिए ज्यादा फायदेमंद है?
मेरे विचार से एसएमई के लिए को-वर्किंग ज्यादा फायदेमंद है। उन्हें कम खर्च में बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर मिलता है। उन्हें कई बार कुछ घंटों के लिए ही जगह की जरूरत पड़ती है। हमारे बिजनेस में 40% रेवेन्यू एसएमई से आता है। इतना ही बड़ी कंपनियों से और 20% स्टार्टअप और फ्रीलांसर से आता है।
किस तरह की कंपनियों से को-वर्किंग स्पेस के लिए डिमांड आ रही है?
अभी हमारे 30-32% क्लायंट आईटी/आईटीईएस, बीपीओ, केपीओ जैसी कंपनियां हैं। दूसरी कंपनियों में क्रिएटिव, फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी, शिपिंग और टेलीकॉम प्रमुख हैं। हमारे पास इन सेक्टर की बड़ी कंपनियां भी आ रही हैं। इनमें रिलायंस भी शामिल है।
को-वर्किंग में कितनी संभावना है?
पिछले साल हमारा रेवेन्यू तीन गुना बढ़ा। इस साल भी ऐसी उम्मीद है। नए सेंटर पर 4-5 महीने में 90-95% ऑक्यूपेंसी हो जाती है। भारत में यह बिजनेस हर साल लगभग दोगुना हो रहा है। अभी करीब 1.1 करोड़ वर्ग फुट को-वर्किंग में है। यह 5 साल में 10 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत में हर साल दोगुना बढ़ रहा है को-वर्किंग स्पेस, यह एसएमई के लिए ज्यादा फायदेमंद, उन्हें कम खर्च में बेहतर सुविधाएं मिलती हैं
इन जगहों पर आप किस तरह की सुविधाएं देते हैं?
यह लोगों या कंपनियों की जरूरत के मुताबिक होता है। हम खाने-पीने के साथ हेल्थ जैसी सुविधाएं भी देते हैं। फूड और हेल्थ कंपनियों से करार है तो लोगों को डिस्काउंट पर सुविधाएं मिल जाती हैं। अगर किसी छोटी कंपनी के पास आईटी या एडमिन का स्टाफ नहीं है, तो वह भी देते हैं। हमारे साथ जो कंपनियां जुड़ी हैं, उनके लिए ग्रुप इंश्योरेंस की भी सहूलियत है। कार्ड कंपनियों से करार है तो लोन भी कम ब्याज पर मिल जाता है।
अमित रमानी
9 शहरों में 1,300 कंपनियों को सेवाएं दे रही है ‘ऑफिस’
अप्रैल 2015 में कंपनी शुरू हुई। अभी 9 शहरों के 55 सेंटर में 25,000 सीटें हैं। एक साल में 100 सेंटर पर 50,000 सीटें हो जाएंगी। ये सेंटर बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा, हैदराबाद, पुणे, कोलकाता, और चंडीगढ़ में हैं। जयपुर, अहमदाबाद, भुवनेश्वर, कोच्चि और इंदौर में विसातर होगा। अक्टूबर से मुनाफे में है। करीब 1,300 कंपनियों को सेवाएं दे रही है।
को-वर्किंग से खर्च में 50% तक बचत
कंसल्टेंसी फर्म जेएलएल के मुताबिक जनवरी से जून तक को-वर्किंग कंपनियों ने 19 लाख वर्ग फीट जगह लीज पर दी। यह 2017 की पहली छमाही में 6.4 लाख वर्ग फीट थी। पिछले साल लीज पर दी कुल जगह का 5% को-वर्किंग में गया। को-वर्किंग से छोटी कंपनियां अपने खर्च 30% तक कम कर सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बड़ी कंपनियों को 50% तक बचत संभव है।
पिछले साल 3 गुना बढ़ा रेवेन्यू
साल रेवेन्यू
2016-17 18
2017-18 56
2018-19* 170
(आंकड़े करोड़ रु. में, *लक्ष्य)
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